फ़िज़ा में ज़हर भरा है जरा संभल कर चलो,मुखालिफ आज हवा है जरा संभल कर चलो,कोई देखे न देखे बुराइयां अपनी,खुदा तो देख रहा है जरा संभल कर चलो।

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दौलत की चाह थी तो कमाने निकल गए,दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए,बच्चों के साथ रहने की फुर्सत न मिल सकी,फुर्सत मिली तो बच्चे ही घर निकल गए।

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फलसफा समझो न असरारे सियासत समझो,जिन्दगी सिर्फ हकीक़त है हकीक़त समझो,जाने किस दिन हो हवायें भी नीलाम यहाँ,आज तो साँस भी लेते हो ग़नीमत समझो।

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समझने ही नहीं देती सियासत हम को सच्चाई,कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पन नहीं मिलता।

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जो तीर भी आता वो खाली नहीं जाता,मायूस मेरे दिल से सवाली नहीं जाता,काँटे ही किया करते हैं फूलों की हिफाज़त,फूलों को बचाने कोई माली नहीं जाता।

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अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे​,फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे​,ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे​,अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे

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रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है,चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है,रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं,रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है।

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